उर्स-ए-साबिर पाक: सूफी संतों और मस्त मलंगों की धुनों पर सात दिनों तक बंटेगा साबरी लंगर
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उर्स-ए-साबिर पाक: सूफी संतों और मस्त मलंगों की धुनों पर सात दिनों तक बंटेगा साबरी लंगर
15 कुंतल आटे से बनी रोटियों से हुई लंगर की शुरुआत, 12 रबीउल अव्वल तक होगा वितरण
tahalka1news
कलियर । दरगाह पिरान कलियर हजरत मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक रहमतुल्लाह अलैह के 757वें सालाना उर्स/मेले का आगाज़ बड़े साबरी लंगर से हुआ। परंपरा के अनुसार हर वर्ष रबीउल अव्वल की सातवीं तारीख को यह लंगर उठाया जाता है और 12 रबीउल अव्वल तक लगातार चलता है।
ज्वाइंट मजिस्ट्रेट रूड़की/मेलाधिकारी दीपक रामचंद्र सेठ के आदेशानुसार इस बार भी दरगाह के खादिम और लंगर इंचार्ज असलम कुरैशी, यावर मियां, शाह सुहैल मियां, नोमी मियां आदि को जिम्मेदारी सौंपी गई। उनके नेतृत्व में पहले फातिहा ख्वानी की गई और फिर सूफी संतों की गद्दियों और मस्त मलंगों की धुनों पर लंगर उठाया गया।
लंगर इंचार्ज असलम कुरैशी ने बताया कि शुरुआत में करीब 15 कुंतल आटे की रोटियाँ तैयार कर बाटी जाती हैं, जबकि उर्स में भीड़ बढ़ने पर यह मात्रा बढ़ाकर 25 कुंतल तक कर दी जाती है। यह लंगर रोज़ाना हजारों जायरीनों तक पहुँचता है और उर्स के आख़िरी दिन तक जारी रहता है।
इस अवसर पर दरगाह प्रबंधक रजिया, सय्यद इंतखाब आलम, राव शारिक, राव सिकंदर हुसैन, मोहम्मद हारून, अफजाल अहमद समेत कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।
उर्स-ए-साबिर पाक में लगने वाला यह लंगर सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि भाईचारे, इंसानियत और सूफी परंपरा का प्रतीक माना जाता है। सात दिन तक चलने वाला यह आयोजन न सिर्फ जायरीनों को पेट भर भोजन कराता है, बल्कि उन्हें सूफी संतों की शिक्षा और उनकी मोहब्बत का संदेश भी देता है।

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